मूल अधिकारों में संशोधन
मूल अधिकारों में संशोधन किया जा सकता हैं या नही यह एक विवादास्पद विषय रहा हैं जिस पर समय समय पर भारतीय न्यायलयों ने अपने प्रमुख निर्णयों के माध्यम से मार्गदर्शन किया हैं इस सम्बन्ध में कुछ प्रमुख निर्णय निम्नलिखित हैं
निर्णय संख्या 1.
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ ए . आई . आर. 1951 सुप्रीम कोर्ट 458
इस वाद में सविधान संशोधन अधिनियम १९५१ की विधि मान्यता को चुनौती इस आधार पर दी गई कि संशोधन संविधान के भाग 3 (मूल अधिकारों ) को कम करता हैं या छीनता हैं जबकि अनुच्छेद 13 यह उपबंध करता हैं कि "राज्य कोई ऐसी विधि नही बनाएगा जो नागरिकों के भाग 3 में दिए गए अधिकारों कों कम करें या छीने.
याचिका कर्ताओं का यह तर्क था कि 368 के अंतर्गत पारित 'संविधान संशोधन 'भ अनुच्छेद 13 के अंतर्गत "विधि" हैं और भाग 3 के अधिकारों के विरुद्ध होने के कारण असंवैधानिक हैं.
याचिका कर्ताओं के तर्क को अस्वीकार करते हुए उच्चतम न्यायलय ने कहा कि अनुच्छेद 13 में केवल वे विधि आती हैं जो विधायी शक्ति के प्रयोग में बनाई जाती हैं, न कि संविधान संशोधन जो संविधायी शक्ति के प्रयोग में बनाई जाती हैं अनुच्छेद 368 द्वारा किये गए संशोधन संविधानिक होंगे भले ही मूल अधिकारों के विरुद्ध क्यों न हों.
निर्णय संख्या 2.
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य ए. आई. आर. 1965 सु. को. 845
इस वाद में शंकरी प्रसाद के निर्णय का ही अनुमोदन किया गया.
निर्णय संख्या 3. .
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य ए. आई. आर. 1967 सु को 1643
इस वाद में उच्चतम न्यायालय नें 6:5 के अनुपात में बहुमत से शंकरी प्रसाद और सज्जन सिंह के मामले में दिए गए अपने निर्णयों को उलट दिया और अभिनिर्धारित किया कि संसद को भाग 3 में संशोधन की शक्ति प्राप्त नही हैं.
न्यायधीश सुब्बाराव ने निम्न मत व्यक्त किया .
a. संविधान संशोधन शक्ति अनुच्छेद 245,246, 248 में हैं न कि अनुच्छेद 368 में, अनुच्छेद 368 में केवल संशोधन प्रक्रिया हैं
b. संशोधन अनुच्छेद 13 में प्रयुक्त "विधि" शब्द के अंतर्गत "विधि" हैं और यदि वह मूल अधिकारों को छीनती हैं तो "शून्य" हैं .
विधि दो प्रकार की होती हैं
- साधारण
- संविधायी संशोधन विधि
मुख्य न्यायाधिपति सुब्बाराव ने 'भविष्यलक्षी" सिध्दांत को लागु किया .
24वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971
सरकार ने गोलकनाथ मामले में उत्पन्न कठिनाई को दूर करने के लिए संविधान का 24 वां संशोधन अधिनियम पारित किया, इस संशोधन से अनुच्छेद 13(2) में संशोधन किया गया. इसमें खंड 4 जोड़ा गया जो यह उपबंधित करता हैं किसंसद द्वारा अनुच्छेद 368 के अधीन पारित कोई भी विधि , अनुच्छेद 13(2) में प्रयुक्त" विधि" के अंतर्गत नही आएगी. अनुच्छेद 368 केवल संशोधन की प्रक्रिया का ही उपबंध नही करता वरन उसके अंतर्गत संशोधन शक्ति भी निहित हैं.
24 वें संविधान संशोधन को चुनौती
निर्णय संख्या 4.
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य ए आई आर 1973 सु को 1461
इस ऐतिहासिक मामले में संविधान के 24वें संशोधन अधिनियम की विधि मान्यता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई. इस मामले में मुख्य विचारणीय प्रश्न यह था कि संविधान के अनुच्छेद 368 में संसद को संशोधन की जो शक्ति प्राप्त हैं, उसकी सीमा क्या हैं ?
सरकार का तर्क :- संसद की यह शक्ति असीमित व् नियंत्रित हैं और यह किन्ही विविक्षित परिसीमाओं द्वारा सीमित नही हैं.
याचिकाकर्ता का तर्क :- संसद को संविधान को नष्ट करने की शक्ति प्रदान नही की गई हैं उनकी शक्ति असीमित नही हैं.
निर्णय :- उच्चतम न्यायलय की 13 न्यायधीशों वाली विशेष न्याय पीठ ने 7:6 के अनुपात से यह निर्णय दिया कि अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद की संविधान में संशोधन की शक्ति प्रयाप्त व्यापक हैं, किन्तु वह असीमित नही हैं और वह ऐसा कोई संशोधन नही कर सकती जिससे संविधान का मूल तत्व या आधार भूत ढांचा नष्ट हो जाए. संसद इस शक्ति पर विविक्षित परिसिमाए हैं.
⧪⧪⧪⧪
अगला विषय आधार भूत ढांचे का सिद्धान्त....